October 23, 2020

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आज का व्यक्तिगत व परिवारीक तनावपूर्ण जीवन मैकाले की शिक्षा पद्धति द्वारा भारतीय संस्कृति व परंपरा से बलात्कार की देन


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मुकेश सिंह चौधरी (Russia)

सनातन धर्म व संस्कृति अपने आप में एक मिसाल है। और भारतवर्ष में पुरातन काल से इसका बोलबाला रहा है पहले शिक्षा का मंदिर गुरुकुल हुआ करते थे। जहां पर शिक्षा ग्रहण की जाती थी और गुरुकुल की शिक्षा में गुणवत्ता संस्कार व संस्कृति का संगम देखने को मिलता था, जिसकी समाज में एक अलग ही पहचान थी। लेकिन समय के साथ पश्चिमी देशों ने आधुनिकता के नाम पर इतनी ज्यादा तरक्की कर ली कि उनको भारतीय शिक्षा पद्धति व संस्कृति चुभने लगी क्योंकि यहां की शिक्षा पद्धति उनके मुकाबले बहुत आगे थी और गुणवत्ता का स्तर उच्च था जिसको तोड़ने के लिए भारतवर्ष में आधुनिकता के नाम पर मैकाले की शिक्षा पद्धति को लागू किया गया और समय के साथ इसमें पाश्चात्य शिक्षा को ऊपरी स्तर पर रखा गया। लोगों का आकर्षण पाश्चात्य शिक्षा की ओर करना उनका मूल उद्देश्य था जिसे भारतीय अपनी गुणवत्ता व संस्कारपूर्ण गुरुकुल की शिक्षा को नीचा समझे तथा उससे धीरे-धीरे दूर हटते जाए और हुआ भी यही।
शाम को सोने से पहले बुजुर्ग बच्चों को ज्ञानवर्धक कहानियां सुनाते थे जिससे उनको अपनी भारतीय संस्कृति और परंपरा की जानकारी भी मिलती थी आजकल वह विलुप्त हो चुकी है। अब अगर बच्चों को सुनने को मिलता है तो सिर्फ यही कि प्लान का बेटा या बेटी के इतने नंबर आ गए जिनका की बेटी के या बेटे के इतने नंबर आ गए या वह यह नौकरी लग गया, नया अच्छा बिजनेस कर लिया इतने रुपए कमाता है सिर्फ अब जीवन एक मशीनरी बन चुका है। इन सब से बाहर निकलने के लिए ना तो उपयुक्त माहौल है और ना ही कोई निकलने दे रहा है। माता पिता अपनी संतान की इच्छा या उनकी भावनाओं को समझने की बजाय उन पर आस पड़ोस के परिवारों में क्या चल रहा है को देखकर जबरदस्ती बच्चों को उस तरह बनाने की कोशिश करते हैं जबकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर इंसान अपने अपने मकसद के लिए आता है और जबरदस्ती कुछ थोपना अच्छा नहीं होता है पढ़ाई के क्षेत्र में लाखों रुपए माता-पिता लगाते हैं अपने बच्चों के लिए लेकिन जरूरी नहीं कि वह सार्थक हो मैंने अपने पोस्ट व पेज के माध्यम से अपने भारतीय समाज को आधुनिकता के युग में संस्कृति व परंपरा को बचाए रखने के लिए जागरूक करने हेतु मेरे शोध व अनुभव को आप लोगों तक लेकर आता हूं आगे आप पर हैं कि आप क्या सोचते हैं या नहीं। बच्चों को इस दिखावेपन या दिखावटी दुनिया की बजाय उनको ज्ञानवर्धक व ऊर्जात्मक विकास की जरूरत है जिससे उनके सोचने समझने में निर्णय लेने की क्षमता संतुलित हो जिसमें ऊर्जावान प्रतिरक्षा प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जो उनकी जन्म तारीख की श्रेणी ज्ञात कर उस आधार पर नाम की श्रेणी के अनुसार नाम रखने से उनके सोचने समझने में निर्णय लेने की क्षमता संतुलित होगी तथा उन्हें अकारण परेशानियों और लोगों से बचने में मदद मिलेगी। जिसका जिक्र https://m.facebook.com/uniquerahasyalogy पेज की अन्य पोस्टों पर भी किया हुआ है। आओ हम सब मिलकर #एकपरिवारएकसदस्यअभियान के माध्यम से लोगों को इस पेज से जुड़े जिससे अपनी भारतीय संस्कृति और परंपरा को संजोए रखने के साथ-साथ वर्तमान में आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक बने।
अब 21वीं सदी में आकर शिक्षा का इतना बुरा हाल है कि इसने बच्चों का बचपन छीन लिया। आजकल के हम माता-पिता भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। बच्चों के खेलने कूदने के दिन छीन लिए और खुले दिमाग से सोचने की आजादी भी छीन ली क्योंकि आजकल छोटी अवस्था में ही बच्चों छोटे स्कूलों में भेजना शुरू कर दिया जाता है जहां पर शिक्षा के नाम पर उनको इतना ज्यादा काम दिया जाता है कि अपने बारे में सोचने के लिए समय ही नहीं रहता जैसे ही स्कूल से घर आते हैं तो माता पिता भी एक ही तरफ ध्यान रखते हैं कि बच्चा पढ़ रहा है या नहीं आजकल का बचपन अकोले की शिक्षा पद्धति की भेंट चढ़ चुका है। यह पाश्चात्य शिक्षा मात्र दिखावा है। अगर आज से 20 साल पहले के दौर में देखेंगे तो उस समय जिन लोगों ने डिग्रियां ली थी अच्छे मार्क्स भी आए थे वह भी बेरोजगार हैं और जो शिक्षक आजकल शिक्षा देते हैं दिल से यह बात उनको भी पता है कि यह शिक्षा मात्र एक छलावा है इसके सिवाय कुछ नहीं, लेकिन उनकी भी अपनी मजबूरी है रोजगार का सवाल है और शिक्षा पद्धति जो लागू हुई है उसको बदलना उनके हाथ में नहीं आजकल के इस तकनीकी युग में इस शिक्षा का मकसद ज्यादा कुछ नहीं बस 30 साल तक डिग्रियां लेने में लगे रहो कहीं भी रोजगार के पर्याप्त मात्रा में अवसर नहीं है और जो लोग ऊंचे पदों पर बैठे हुए हैं या सफल होते हैं, जरूरी नहीं कि उनके पास अच्छे मार्क्स की डिग्रियां है। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में वर्तमान शिक्षा पद्धति में बचपन छीनने तनाव इरिटेशन बेरोजगारी के सिवाय कुछ नहीं है और जो हमारे बुजुर्ग हैं उनको आज भी अगर पूछेंगे तो वह सिर्फ दो या तीन पड़े हुए होंगे लेकिन उनका गणित उनकी सोच उनकी समझ हमारे से हजारों गुना अच्छी है मकोली की शिक्षा पद्धति भारतीय संस्कृति और परंपरा के साथ पाश्चात्य देशों द्वारा किया हुआ बलात्कार है जिसने भारतीय संस्कृति और परंपरा को झकझोर कर रख दिया पुरातन वेदों और ग्रंथों में इस सृष्टि का साथ दिया हुआ है और अपने आप में वह एक विज्ञान है जिसको कुचलना पाश्चात्य देशों का मकसद था जिसमें वह कामयाब भी हुए सलाम है उन गद्दार भारतीयों को जिन्होंने अपने ही देश की संस्कृति और संस्कारों को दांव पर लगाने के लिए यह खेल खेला और भारत की फलती फूलती संस्कृति और परंपरा को पाश्चात्य संस्कृति की बलि चढ़ा दिया।