October 30, 2020

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समाज व प्रकृति के बीच संघर्ष


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*समाज व प्रकृति के बीच संघर्ष:*
आप लोग आज कल समाचार में दिल्ली के दर्द को खूब देख रहे है। क्या आपने कभी सोचा कि ये दर्द ऐसा क्यों हो रहा है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है नही क्यों सोचेंगे चुकी अभी आपके बच्चे थोड़ी मर रहे है वो तो दूसरे के हैं, कौन अपने लोग है समाचार दलम देखिए घर मे मजा लूटिए यही तो हो रहा है। आप लोग भी करिये क्यों, आज सोचने का विषय हैं वो कौन लोग थे जो प्रकृति के पूजक थे। जिसे आप और हम लोग अशिक्षित कहते है। जिनको आज के समाज मे हेय की दृष्टि से देखा जाता है। उन्ही की देन है कि आप अभी तक बचे है। वो किसी जाति धर्म के लोग नही है। प्राकृतिक संसाधनों के पुजारी लोग है।

प्रकृति किसी सरकार जितनी बेरहम नहीं है जो अमीर -गरीब, हिंदू- मुस्लिम, छोटे -बड़े और शहर – गाँवो में अंतर करे ! प्रकृति सबको एक नजर से देखती है !
कई लोग खुश है की अभी केवल दिल्ली और अधिकतर बड़े शहर हि गैस चैंबर बने है और वो छोटे शहरों में सुरक्षित है ! मैं उन्हें भरोसा दिलाता हूँ कि प्रकृति के न्याय पर भरोसा करें दिल छोटा न करें केवल धैर्य रखें और प्रतीक्षा करें !

जल्दी हि उनका गाँव उनका शहर भी गैस चैम्बर बनेगा ! दम उनका भी फूलेगा, फेफड़े उनके भी जवाब देंगे और एक दिन हृदय परेशान होकर रक़्त फिल्टर करना हि बंद कर देगा !

हाँ इस बीच तुम बहुमंज़िला इमारतें बनाते रहो, जंगल साफ कर खेती की जमीन तलाशते रहो, पेड़ पौधों के वस्त्र पहने पहाड़ों का चीरहरण करते रहो, पूरे के पूरे जंगल धन पिपासु व्यापारियो को बेच दो ताकि वहाँ की जमीन से हरियाली को हटाकर वो काले कोयले की कालिमा बिखेरते रहे ! आरे के सैंकड़ों साल पुराने वन को उजाड़ दो ताकि वहाँ तुम्हारी मेट्रो दौड़ सके ! यमुना किनारे हजारों हैक्टेयर जमीन से पेड़ पौधों को साफ कर पौधों की एक पूरी संस्कृति एक पूरी पीढ़ी को नष्ट कर दो ताकि डबल श्री रविशंकर वहाँ विश्व सांस्कृतिक महोत्सव का ड्रामा कर सके ! खूब पटाखे चलाओ ताकि तुम्हारा धर्म बचा रहे ! शादियों में जोरदार आतिशबाजी करो ताकि कई किलोमीटर दूर से तुम्हारी शान शौकत नजर आये ! हर साल पुराना पड़ चुका फर्नीचर भी बदलते रहो ! घरों के आस पास से जितना हो सके उतने पेड़ो को काट डालो ताकि उनकी पत्तियों का कचरा तुम्हारे घर के दरवाजे तक नहीं पहुँच पाये ! ऐसी प्रगति की इबारत लिखो की दिन रात फैक्ट्रियों से निकलता काला धुँआ सूरज की रोशनी को भी ढक दे !

और हाँ, जल जंगल जमीन के रखवाले आदिवासी अगर तुम्हारी इस मृत्यु पैदा करने की प्रगति के बीच आये तो उनको नक्सली बताकर मार दो ! उनको दकियानूसी, अशिक्षित, पिछड़ा बोलकर उनका उपहास उड़ाओ !
जब भी समाज मे जनजातिय समाज की बात आई तो लोगो ने उनके लिए कभी आवाज नही उठाया है। सबसे दर्द का विषय तो यह है कि जिस समाज के पूर्वज उन क्षेत्रों से आये है वो लोग भी अब तक उनके लिए आवाज नही उठाते हैं।
समाज मे आप क्या कर रहे है कैसे कर रहे है, प्रकृति के पास सबका लेखा जोखा रहता है बस निर्णय कब और कैसे देना है। वह समय पर निर्णय देती रहती है। आज समाज का सबसे पढ़ा लिखा वर्ग जो है जिसे आप बुद्धि जीवी खतरा है वही सबसे सोया हुआ है या यूं कहें कि उसकी आत्मा मर गयी है। पैसों की भूख के आगे सबको बर्बाद करने में आगे है।
गांव का किसान या मध्यम वर्ग तो आज भी प्रकृति सरंक्षण का कार्य कर रहा है। लेकिन यह समाज कब जागेगा इस पर विचार कब आएगा यह सवाल आज भी जेहन में पैदा होता है।

तुम्हारी इस निर्लज्जता का दण्ड ये प्रकृति एक दिन तुमको अवश्य देगी ।
प्रभाकर सिंह रिसर्च स्कॉलर इलाहाबाद विश्वविद्यालय।