October 31, 2020

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किसान पराली जलाने को विवश क्यो है ? या क्यो जला देते हैं.


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एसी मे बैठकर अय्याशी करने वाले प्रदूषण का सारा ठीकरा किसानों पर फोड़ रहे है। किसान पराली जलाने को विवश क्यो है ? या क्यो जला देते हैं। महंगी गाड़ियों में मटरगस्ती वाले कभी सोचे हो इस संबन्ध में। कृषि से पशुपालन का वह ऑर्गेनिक रिश्ता नही रहा अब। इस रिश्ते को वैज्ञानिक विकास के नाम पर खत्म किसने किया ? ठंडे दिमाग से सोचा है कभी…। इसका सबसे ज्यादा फायदा कौन सा वर्ग उठाया। एसी में अय्याशी और महंगी गाड़ियों में मटरगस्ती करने वाले लोगो ने ही इस रिश्ते को अपने फायदे के लिए तोड़ा। किसानों के पास वह आर्थीक हैसियत नही है कि पराली का डिस्पोजल सही तरीके से कर सके। आज जितनी ऊर्जा किसानों को गाली देने में लगा रहे हो उतनी ऊर्जा अगर पोलिटिकल पॉल्यूशन के खिलाफ लगा दो तो समस्या का निदान ही हो जाएगा। ऐसा नही करोगे क्योकि तुम्हे रहने के लिए एक घर के बदले आलीशान बंगला चाहिये सोने के लिए बीबी के अलावे कई औरतें चाहिये जीवन जीने के लिए असीमित सुविधा और सात पुश्तों की सुरक्षा के लिए असीमित धन। आज अगर कुहरा घना हक तो उसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हल्ला मचाने वाले लोग है। किसान भूखे मरते है तो यही वर्ग दलाली में व्यस्त रहता है। आज बारी तुम्हारे मरने की ।किसानों के विरोध में अब दिल्ली के एलीट को बाहर आना चाहिए, किसानो के बगल से निकलते समय नाक-भौंह सिकोड़ने वाली “मेम साब” और उपजाऊ जमीन की मिट्टी को गंदगी कहने वाले “बाबु साहब” को भी बाहर आना चाहिए,
दिल्ली गैस चैंबर बन चुका है इन किसानों ने बेड़ा गर्क कर दिया है अगर इन एलीट वर्ग के “सभ्य नागरिकों” में थोड़ी भी अक्ल है क्लीन दिल्ली ग्रीन दिल्ली देखना चाहते हैं तो सड़क पर आकर विरोध करें उन गरीब किसानों का जिनकी जलाई पराली द्वारा बाबु साहब और मेम साहब को इम्पोर्टेड गाड़ियां चलाने में तकलीफ हो रही है, अगर बाबु साहब अपनी मंहगी गाड़ी से इंड्रस्ट्री तक जाते जाते दुर्घटना का शिकार हो गए तो कौन जिम्मेदार होगा ?जिन्हें किसान का ‘क’ और खेती का “ख” नहीं पता! जो अपने कुत्तों के लिए अलग गाड़ी रखते है वो किसानों को पराली ना जलाने की अनचाही सीख दे रहे है।

क्या वो लोग अपने जीवन के मात्र 2 दिन एक ग़रीब किसान की तरह व्यतीत कर सकते है? वैसे भी कथित पराली का प्रदूषण में मात्र 8% हिस्सा है बाक़ी दोष हमारा है। प्रकृति का सबसे ज़्यादा दोहन शहरी लोग करते है। तुम जितने पानी से बाथटब में स्नान करते हो, Showers लेते हो, उतने में तो हमारी 4 भैंसे नहा लें।

किसानों के माथे ठीकरा फोड़ना बंद करो। तुम सुई भी बनाते हो तो उसकी क़ीमत ख़ुद निर्धारित करते हो लेकिन बेचारा किसान तो अपनी फ़सल की क़ीमत ख़ुद भी तय नहीं कर सकता।

और हाँ सुनो, जिन्हें पराली जलाने से समस्या है, उन्हें किसानों के खेतों में जाकर श्रमदान करना चाहिए। स्वास्थ्य भी बना रहेगा और प्रदूषण भी नहीं होगा।
प्रभाकर सिंह रिसर्च स्कॉलर इलाहाबाद विश्वविद्यालय।