October 26, 2020

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किसान, कर्ज और खुदकुशी में हरित क्रांति का योगदान और बचाव


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मुकेश सिंह चौधरी (Russia)

किसान, कर्ज और खुदकुशी में हरित क्रांति का योगदान और बचाव

भारत हमेशा से भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। जहां पर 70% लोग किसानी का काम करते हैं। खेती को भारतीय अर्थव्यवस्था की #रीडकीहड्डी माना जाता है। कहीं ना कहीं से किसानों की खुदकुशी के हर रोज नये मामले सामने आते हैं। क्या कभी सोचा है कि किसान खुदकुशी क्यों करता है? इसके जिम्मेदार कौन है? मेरे अनुसार जो कुछ भी अप्रिय घटना घटती है, तो उसके पीछे जरूर ना जरूर कोई गहरी साजिश होती है जिस देश की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है और ऐसे कृषि आधारित देश में अगर किसान इस तरह से आत्महत्या करता रहा तथा उसके प्रति किसी ने गौर नहीं किया तो आप खुद भी जानते हैं कि उस देश का क्या हाल होगा।
मैं खुद एक दार्शनिक, शोधकर्ता, विचारक, लेखक इत्यादि इत्यादि होने के साथ-साथ किसान का बेटा भी हूं और मेरा फर्ज बनता है कि मैं अपनी बेबाक राय रखूं जिससे इस देश की सरकार, बुद्धिजीवी और किसानों में जागरूकता आए। मैं बहुत समय से जब भी किसानों की आत्महत्या के बारे में सुनता हूं तो व्याकुल हो उठता हूं इसीलिए आज यह आलेख इस देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले मेरे किसान भाईयों को समर्पित है। आशा है कि सरकार और बुद्धिजीवी इसके प्रति संचेत हो या ना हो लेकिन किसान वर्ग जरूर संचेत होगा।
मेरे शोध के अनुसार 1960 के दशक की हरित क्रांति के माध्यम से ऐसा खेल खेला गया जो। इन सब समस्याओं की जड़ है। हरित क्रांति नामक इस खेल ने किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर ही नहीं किया बल्कि इस देश कि वर्तमान व आने वाली पीढ़ी के लिए अनेकों समस्याएं जैसे मानसिक, औसत आयु में कमी का होना, अनेकों बीमारियों का बढ़ना, स्वास्थ्य के स्तर में गिरावट, किसानों में कंगाली इत्यादि इत्यादि भी होलसेल में उपलब्ध करवा दी। हरित क्रांति से संवर्धित बीजों के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने का लालच देकर एक तीर से कई शिकार किए गए। इन संवर्धित बीजों से अनाज का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन खेती में मेंटेनेंस खर्चा उससे कई गुना बढ़ा जिसके चलते केमिकल, फर्टिलाइजर इत्यादि का उपयोग धड़ल्ले से होने लगा और इससे विदेशी खाद बीज की कंपनियों के साथ-साथ हॉस्पिटलों और दवाइयों के क्षेत्र में भी खूब तरक्की हुई। इन संवर्धित बीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है जिसके चलते अधिक मात्रा में फ़र्टिलाइज़र, केमिकल्स का प्रयोग करने से मृदा यानी धरती के स्वास्थ्य में भी गिरावट आयी।
साल दर साल इनकी मात्रा बढ़ाने के चलते अनाज में तो खूब वृद्धि हुई लेकिन उसके साथ साथ लागत बड़ी और स्वास्थ्य में गिरावट के कारण लोगों में बीमारियां धड़ल्ले से फैलने लगी इसका अगर उदाहरण देखना हो तो आप उन क्षेत्रों में देखो जहां पर साल में चार खेती होती है वहां के हर घर में आपको कैंसर, ब्लड प्रेशर, शुगर व अन्य असाध्य बीमारियों के पेशेंट मिलेंगे। जहां पर सालाना तीन फसल होती है वहां पर उनकी तुलना में कम, दो खेती होने वाली जगह में उससे कम और जहां पर खेती नहीं होती है वहां पर कैंसर के पेशेंट ना के बराबर हैं और कैंसर के नाम पर जितनी दवाइयां जितने हॉस्पिटल बिजनेस कर रहे हैं उन पर हरित क्रांति से ही मेहरबानी हुई वरना इससे पहले इतनी बड़ी तादाद में ना तो मरीज थे ना ही कैंसर था। आज से 30 साल पहले कैंसर जैसी बीमारी का नाम लेना भी अशुभ माना जाता था। किसान को हरित क्रांति के नाम पर जो लोलीपोप रुपी लालच दिया गया उस मकड़जाल में किसान इतना फस चुका है कि वह साल दर साल कर्ज की चपेट में आता गया और इन सब से मानसिक परेशानी के कारण दबाव में आकर आत्महत्या के मामले भी बहुत अधिक बढ़ रहे हैं।
पहले के समय में जो हमारे देसी बीज से फसल का उत्पादन होता था उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती थी और वह स्वास्थ्यवर्धक भी थे जबकि हरित क्रांति के बाद अनाज के क्षेत्र में बहुत बड़ी क्रांति आई है लेकिन साथ-साथ उसकी गुणवता व हमारे स्वास्थ्य में गिरावट यानी की औसत आयु में कमी आ चुकी है और नई-नई बीमारियां दिनों दिन खड़ी होती जा रही है। आज हम जो कुछ भी खा, पी रहे हैं सब का सब जहर है। किसान हरित क्रांति की लत को छोड़ नहीं पा रहे। बड़ी कंपनियां चाहती भी नहीं कि किसान इस लालच को छोड़ें वरना केमिकल, फर्टिलाइजर और यह बड़े-बड़े हॉस्पिटल की दुकानों पर ताले लगने शुरू हो जाएंगे। जहां पर खेती नहीं होती यानी कि विरानी जमीनें हैं वहां पर ना तो ज्यादा कैंसर के मरीज और ना ही दूसरे रोगों के मरीज हैं। हरित क्रांति के प्रभाव से इन सब समस्याओं के साथ-साथ सहनशक्ति की कमी भी आई है जिसके चलते यह सब घटनाएं होती है।
इससे बचाव के उपाय- मेरे शोध अनुसार इन सब की जड़ हमारी सोचने समझने व निर्णय लेने की क्षमता का असंतुलित होना है, जिसके चलते हम लालच में फंस जाते हैं। अब जब इसमें फस ही गए हैं तो निकलना संभव नहीं है लेकिन इससे बचाव जरूर संभव है। बचाव के लिए अपनी सोचने, समझने व निर्णय लेने की क्षमता का संतुलित होना जरूरी है जिसमें ऊर्जावान प्रतिरक्षा प्रणाली एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिससे अकारण परेशानियां इंसान को नहीं घेरती है और वह विपरीत परिस्थितियों में निकलने की क्षमता रखता है। इससे संबंधित अधिक जानकारी के लिए आप इस पेज https://m.facebook.com/uniquerahasyalogy पर विजिट कर सकते हैं।

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