October 31, 2020

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तुम चाहते हो आज भी लिखूं, कुमकुम, चन्दन रोली जी

तुम चाहते हो आज भी लिखूं, कुमकुम, चन्दन रोली जी,जबकि मेरे कान गूंजती,बन्दूकों की गोली...
तुम चाहते हो आज भी लिखूं, कुमकुम, चन्दन रोली जी,
जबकि मेरे कान गूंजती,बन्दूकों की गोली जी।


लुटा महावर, टूटी चूड़ी, बासन्ती अरमान जले,
खूंआलूदा हो गई है, कितने घर रंगोली जी।

गालों और प्यालों की बातें, कैसे कर लूं मैं साथी,
रक्त रंजित हो गई जब, मेरे घर की होली जी।

नागिन सी डसने आती है, चादर की टुटी सलवट,
बिरहा में रोती दुल्हन, दुल्हन की हंसी ठिठोली जी।

माताओं की गोदी सुनी, बहना की सूनी राखी,
बेटी के सिर से साया, बिछड़ा जब हमजोली जी।

सारी वादी खून सरापा, घायल सीना भारत का,
उठो, दहाडो, अब अहिंसा की इन्तहां हो ली जी।

बहुत चाहता लिख नही पाता, कुमकुम, चन्दन रोली जी,
मेरे कानों महज गूंजती,पाकिस्तानी गोली जी।