October 31, 2020

BBC LIVE NEWS

सच सड़क से संसद तक

सोचता पल भर जो, तुझको ठहर जाना था।

दिल मे आदिल ने ठाना, की उधर जाना था,उनकी चाहत मगर, उसको तो मर जाना...
दिल मे आदिल ने ठाना, की उधर जाना था,
उनकी चाहत मगर, उसको तो मर जाना था।
**

पाले पत्थरबाज, होली खून की वो खेलता,
उसने ठाना है, तेरे काँधे से सर जाना था।
**
रात ओ दिन हूर की बातें जो किया करते है,
देखने उनको कभी, उनके घर जाना था।
**
फ़िदायिन बनकर, तूने क्या पाया यारा,
सोचता पल भर जो, तुझको ठहर जाना था।
**
लाशों के ढेर पर , सत्ता का लालच उनका,
देख लेता जो अगर तू , तुझे डर जाना था।
**
इसके बारे में कभी, तूने तो सोचा ही नही,
तू कहाँ आ गया है, तुझको किधर जाना था।
**
बाद मरने के कभी, तूने ये सोचा प्यारे ,
“मुझको ये भी न था मालूम किधर जाना था।”

आदरणीय समर कबीर जी के सहयोग के बाद सुधरी हुई गजल ये बन पाई है