October 27, 2020

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बदल गयी है भी जमाने की रंगत आजकल वही अन्जान बनते है जो सब कुछ जानते भी है


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*बदल गयी है भी जमाने की रंगत आजकल*
*वही अन्जान बनते है जो सब कुछ जानते भी है*।
(बसन्त पंचमी पर आज का सच)
मौसम आज सुबह सुबह परिवर्तन की अगङाई ले रहा है ऋतुओं के राजा बसन्त का आगमन हो रहा है ।बिद्या कि देवी माँ सरस्वती ने बीणा के तार को झंकृत कर दिया है मन्द मन्द सिहरन पैदा करती पछुआ हवा फूलों के खुश्बुओ को समेटे अजीब तरह का माहौल पैदा कर रहो है । हर तरफ हलचल है बाग बगीचो मे पंक्षी कर रहे कलरव है।
खेत खलिहान गाँव सिवान का नजारा बदल गया धानी चादर ओढे प्रकृति आज सज सवर कर नवयौवना दुल्हन के तरह मुस्करा रही है। महीनो से भयानक ठंङ केई मार से बेहाल जन जीवन तबाही के रास्ते पर चल निकला था हर तरफ मायूसी थी खामोशी थी। लगातार आसमान पर बादल अठखेलियां कर रहे थे कहीँ झूमकर बरस रहे थे तो कहीं उमङ घुमङ कर हताशा पैदा कर रहे थे।शीत ऋतु का ऋतमास अगले वर्ष आने की आस के साथ आज बिदा हो रहा है।सम्बिदा के हिसाब से सभी अपने पूर्व नियोजित ब्यवस्था में आस्था को समाहित कर सदियों से प्रकृति के चक्र का सम्पादन करते चले आ रहे है। हलाकी जिस तरह से लोग बदल रहे है उसी तरह मौसम भी बदल रहा है । अब न गावो मे पहले जैसे बसन्त पंचमी की चहल पहल है न बाग बगीचे रह गये न आम की अमराईया रही?न अब महुआ के पेड़ रहे न कोयल की कूक कही सुनाई देती! रस मंजरी के लिये लालायित गुन्जन करते भौरे।आम के पेङो पर लगे टिकोरे कही देखने को नही मिलते
फूलो की महकती खूश्बू पर इठलाती तितलियों का झुन्ङ बाग बगीचो के किनारे गहरा पानी का कुन्ङ नील गायो की चहल कदमी फूलो से लदे अरहर के खेत खेतो मे सरसो की पीली पोशाक सब कुछ अनहोनी का आभाश दे रहा है।होने को तो सब कुछ हो रहा है लेकीन किसी भी त्योहार में पहले का मिठास नही लोगों मे अब उल्लास नही! गाव का परिवेश बदल गया एकाकी जीवन नीरसता का पैरहन लिये बिलासिता के सामराज्य मे बदल रहा है।आज के दिन से ही शुरू हो जाता था गावों मे फगुनी मादकता से मस्त गीतों के धुन पर नाचता गाता गवई जीवन! हर्षोल्लास के वातावरण मे बदल जाता था सबका आवरण ! इन्ही हालात को देखकर भोजपूरी गायक ने लिखा बसन्ती चमन मे चहक जाला केहू समय अईसने ह बहकी जाला केहू,पुराने जमाने के कबियो ने भी लिखा बनन मे बागन मे बगरायो बसन्त है? यानि हर तरफ प्रशन्नता’, मादकता, चचंलता ,सार्थकता का माहौल चारो तरफ उछल कूद के साथ शूरू हो जाता रंगो का त्योहार बढ जाता था कोलाहल!
बदलते बदलते परिवेश मे अपनी सनातनी पुरातन ब्यवस्था हे लोगो की आस्था समाप्त हो रही है। नई पीढी फागून के रहस्यमयी दो अर्थी गीतो को फूहङ मानथी है और सरकाई ल खटीया जाङा लागी को ऐङवान्स होने का फार्मूला है मिनरही है। रहन सहन पहनावा सब दिखावा का हो गया है!अब न कोई जान पहचान है न कोई मेहमान है।:हर कोई अपने मे मस्त हॅ खुद ही दरोगा खौद ही दीवान है।मा बाप बोझ बन गये सगे सम्बन्धी दूर हो गये! शराब शबाब के कारण बर्बाद होती ब्यवस्था मे समरसता समाप्त हो गयी! पैतृक पहचान पुरातन परिधान का खत्म हो गया नामो निशान! गांव के गाँव बीरान हो गया! शहर में अब अधिकतर लोगो के घर आबाद हो गया! शहर ही मुफीद स्थान हो गया!
तेजी से बदल रहा है समाज आज सुसंकृत समम्बृद्ध सनातनी सामाजिक ढाँचा चरमरा गया!
हताशा निराशा के बीच बढती आर्थिक अभिलाषा ने अपनो से अलग कर दिया ! उपयुक्त संयुक्त मुखिया युक्त परिवार का बिखंङन हो गया अब तो बस कहने को परिवार रह गया। बदल रहा मौसम दम खम के साथ परिवर्तन का संकीर्तन करते हरहराते मुस्कराते आ रहा है फीर भी आसमान का तापमान बेईमान है, घने कोहरा का पहरा बरकरार है।अजब गजब नजारा है शीतलहर जारी है जब की बसन्त ऋतु की आज हो रही सवारी है।
बिद्यालयो मे बागदेबी की अद्भुत पूजा अर्चना की परिकल्पना साकार हो रही है! सजी सवरी परिधानो मे हंसती खिलखिलाती बालिकाये स्वयं मे माँ सरस्वती का प्रतिरूप बनी अद्भुत परिदृष्य प्रदर्शित करती है।या देवी सर्वभूतेषू बिद्या रूपेण संस्थिता नमस्तैतय नमस्तैतय नम: तस्तैय नमो नम: का ऊद्घोष शिक्षा मन्दिरो मे गूंजायमान हो रहा है।
बदल रहा है दृश्य मौसम का परिदष्य एक मंच पर आज शीश झूका रहें है माँ सरस्वती के पावन चरणों मे गुरू और शिष्य!
बसन्ती आगमन का आचमन आज ऋतुराज कर रहें है जनमानस झूम कर आगत का स्वागत कर आने वाले दिनों में सुखी जीवन की कामना के लिये बन्दना कर रहा है।ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।।
कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्।
वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।।
रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्।
सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।।
वन्दे भक्तया वन्दिता च
चैत्र प्रतिपदा पर ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी और वसंत पंचमी पर ज्ञान की देवी मां सरस्वती को प्रकट कर इस सृष्टि में चेतना भर दी थी। वसंत पंचमी की कहानी कई जगह आती है। पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। वे बहुत प्रसन्न थे। लेकिन, कुछ दिनों में उन्होंने पाया कि सृष्टि के जीव नीरसता से जी रहे हैं। कोई उल्लास, उत्साह या चेतना उनमें महसूस नहीं हो रही है। उन्होंने भगवान विष्णु से विमर्श किया और फिर कमंडल से थोड़ा जल भूमि पर छिड़का। उस जल से सफेद वस्त्रों वाली वीणाधारी सरस्वती प्रकट हुईं। उन्हीं के साथ भूमि पर विद्या और ज्ञान का पहला कदम पड़ा, वह वसंत पंचमी का दिन था ।
मां सरस्वती का आशीर्वाद सब पर बना रहे।
जगदीश सिंह
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