July 8, 2020

BBC LIVE NEWS

सच सड़क से संसद तक

कपड़ा समितियों के नाम पर ठगी करने वाले लोगों ने आजकल अपना ठिकाना शिवपुरी जिले की पोहरी तहसील को बनाया है और निशाने पर है पोहरी तहसील के बैराड़ और आसपास के भोले भाले ग्रामीण.

कपड़ा समितियों के नाम पर ठगी करने वाले लोगों ने आजकल अपना ठिकाना शिवपुरी जिले की पोहरी तहसील को बनाया है और निशाने पर है पोहरी तहसील के बैराड़ और आसपास के भोले भाले ग्रामीण.

आपको बतादें की पहले भी विजयपुर में इसी प्रकार की ठगी में लोगों को गिरफ्तार करवाया जा चुका है।

इनकी कार्य प्रणाली

सबसे पहले ये लोग ठगने के लिए एक जगह का चयन करते है, फिर उस जगह का सर्वे करते है कि इस जगह पहले कपड़ा सोसायटी के नाम पर कोई ठगी हुई है या नही, यदि हुई है तो लगभग कितने समय पूर्व हुई है व किस सोसायटी के नाम पर हुई है, उसके बाद जब ये आस्वस्त हो जाते है कि यहां पूर्व में कपड़ा सोसायटी के नाम पर कोई ठगी नही हुई है या फिर 8/10 साल पहले हुई थी लोग भूल चके होंगे तब ये लोग उस जिले, तहसील या नगर पंचायत में एक गोदाम किराये पर लेते है, जहां पर ये लोग एक दो लाख का कपड़ा रखते है।

इसके बाद ये लोग एक सूचनापत्र को लेकर मोटरसाइकिल से गांव गांव जाते है इस सूचनापत्र में इनके जो नियम लिखे होतें है वह लोगों को अत्याधिक लालच देकर समझाते है, और लोगों को समझाते हैं कि भारत सरकार की योजना के अनुसार प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक कंट्रोल रेट की कपड़े की सरकारी दुकान खोली जा रही है उसमें कपड़ा उसी प्रकार कंट्रोल रेट पर मिलेगा जैसे गेँहू, चीनी, चावल, केरोसिन खाद आदि मिलता है। इसके बाद जो भी एक व्यक्ति एक पंचायत में तैयार होता है उसका एक डीलरशिप फार्म भरते है और उसके द्वारा दिये गए ऑर्डर का 10 प्रतिशत एडवांस जमा करते है जो जो 6000 रुपये से लेकर 24000 रुपये या अधिक तक हो सकता है।

इनके द्वारा दिये जाने वाले लालच

1. ये लोगों को समझाते हैं कि प्रत्येक माह आपको एक निश्चित किराया मिलेगा ही मिलेगा चाहे आपकी दुकान पर कितनी भी कम सेल हो और इस निश्चित किराये का मापदंड आपके द्वारा शुरुआत में लगाई जा रही धनराशि से निश्चित होता है। उदाहरण स्वरूप यदि आप 60000 रुपये लगाकर कार्य कर रहे है तो आपको 1000 रुपये प्रतिमाह और 2 लाख 40000 रुपये की पूंजी लगाकर काम शुरू करने पर 4000 रुपये प्रतिमाह किराया मिलेगा ही मिलेगा।
2. आपका जो भी कपड़ा नही बिकता है 3 माह बाद बदल दिया जाता है, जो बिकता है आपका जो नही बिकता है वह संस्था का, यदि आपको लगता है कि आपको दुकान बंद करनी है तो 3 माह बाद आप पूरा कपड़ा वापसी करके जितना माल बचा है उसका पूरा पैसा वापिस ले सकते है, इन तीन महीने का किराया और आपके द्वारा बेचे हुए कपड़े का कमीशन आपको मिलेगा ही मिलेगा। इसलिए आप तो निश्चित होकर दुकान खोलिये।
3. 30 प्रतिशत कमीशन इनके द्वारा दिया एक और बड़ा लालच होता है, आप 10000 रुपये का कपड़ा बेचते है तो 3000 और 1 लाख का कपड़ा बेचते है तो 30000 रुपये कमीशन के साथ ही साल भर में एक लाख की सेल करने पर 10000 रुपये का बोनस देने का भी ये वायदा करते है, और मजेदार बात ये है कि आज तक 1 प्रतिशत लोगों को भी इन्होंने कोई कमीशन आज तक नही दिया होगा।

ये लोग मासूम लोगों को पहले पूरी तरह विश्वाश में लेते है इसके लिए ये किसी क्षेत्रीय व्यक्ति को अपना एजेंट बनाते है, जिसको ये 20000 या अधिक के वेतन पर नोकरी पर रखते है और/या उसको हर ऑर्डर पर कुछ कमीशन भी देते हैं। इन एजेंटों का काम ग्रामीणों में संस्था की साख पैदाकर उन्हें संस्था का डीलर बनाना होता है जिनको संस्था अनेको सुविधाएं देती है। ये बेचारे एजेंट लोगों के साथ ठगी हो रही है के बारे में तब तक नही जान पाते जब तक संस्था भाग नही जाती।

इन लोगों का एक तय कार्यक्रम होता है कि हमे इतनी तारीख को भागना है उसी के अनुसार ये प्लांनिग करके लोगों को कहते है कि अपना जल्दी से जल्दी माल उठा लो आपको फर्नीचर का पैसा नगद मिलेगा। इसके 2 फायदे होते है 1 इनका जल्दी ही माल बिक जाता है दूसरा ये लोगों को उधार की स्कीम बांटते है उस स्कीम के अनुसार 20000 रुपये एडवांस जमा करने पर 2 लाख का 50000 रुपये एडवांस जमा करने पर 5 लाख का माल उधार दिया जाएगा क्योंकि अब आप संस्था के डीलर है और संस्था की ओर से आपसे ज्यादा सेल करवाने के लिए ज्यादा माल देने की योजना की बात की जाती है। बड़ी बात ये है कि फर्नीचर या उधार माल के नाम पर लिए गए पैसों की ये किसी प्रकार की कोई रसीद नही देते है। और फिर नियत प्रोग्राम के तहत ये रात को भाग जाते हैं।

पुलिस की भूमिका

(पुलिस के आलाधिकारियों और जागरूक पत्रकारों को नीचे की लाइनों को बहुत ध्यान से पढ़ना चाहिए, हम बात कर रहे है इस ठगी के धंधे के फलने फूलने में पुलिस की भूमिका की।)
पुलिस इन ठगों को लेकर बेहद लापरवाह होती है क्योंकि जब ये मौके पर होते है तो साहूकार होते है इसलिए किसी किस्म की कार्यवाही का सवाल ही नही उठता, और इनके भाग जाने पर पुलिस इस डर से की इनको कहाँ से पकड़कर लाएगी बेचारे ठगे गए लोगों से ही दुर्व्यवहार करते हुए भगा देती है और हरसम्भव प्रयास करती है कि उन्हें ठगी के मामले में कोई FIR करनी ही ना पड़े। इसीलिए पिछले 30 वर्ष से भी अधिक समय ये ठगी का कारोबार बदस्तूर जारी है, बेशक ठगने वाले लोग बदलते रहे और ठगे जाने वालों की संख्या लाखों में पहुंच जाने के बाद भी पूरे हिंदी भाषी भारत मे इनपर नाममात्र की FIR दर्ज है जबकि हिंदी भाषी भारत के हर जिले की हर तहशील में कई कई बार ये ठगी हो चुकी है।

इनपर कहाँ दर्ज हैं FIR

भिंड के रहने वाले ये लोग मूलतः शिवहरे समाज से व ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखने वाले लगभग 100 लोग हैं। इनपर 420/34 व अन्य धाराओं में कई केस दर्ज है।

विजयपुर जिला श्योपुर मध्यप्रदेश, राजस्थान के सीकर आदि अनेक जिलों में इन पर FIR दर्ज हैं। खरोरा (रायपुर), राजनांदगांव छत्तिसगड़ में भी इन लोगों पर FIR दर्ज हैं।

क्यों हैं इनके हौसले बुलंद

कुछ FIR होने के बाद भी इन लोगों को पुलिस का कोई डर नही है क्योंकि इनको पता है कि लगभग 30 वर्ष से लगातार ठगी करने के बाद भी इनपर बमुश्किल 10 FIR दर्ज हुई है, अमूमन या तो ठगे गए ग्रामीण लोग पुलिस के पास पहुंच ही नही पाते और अगर पहुंच भी जाएं तो पुलिस इनसे ही अपराधियों जैसा सलूक करती है जिससे ठगे गए लोगों की हिम्मत टूट जाती है। पुलिस के सहयोग न करने की मुख्य वजह इन भागे हुए लोगों को कहाँ ढूंढा जाएगा होती है, इसलिए पुलिस FIR नही करती है। इसलिए ये कभी पकड़े नही जाते।

पुलिस क्यों नही करती इनसे कुछ सवाल

जब ये मौके पर मौजूद होते है और ठगी कर रहे होते है तब यदि पुलिस कठोरता से कुछ सवालों के जबाब इनसे मांग ले तो ये तभी पकड़े जाएंगे और इन्हें भागने का मौका ही नही मिलेगा, बहुत महत्वपूर्ण है नीचे दिए गए सवाल

1. ये जिस संस्था के नाम से कार्य कर रहे है क्या वह संस्था वास्तव में चल भी रही है या नही, क्या उस संस्था ने इन्हें कार्य करने के लिए अधिकृत किया है या नही। उस संस्था के क्या प्रोडक्ट ये अभी बेच रहे है। संस्था के और सप्लाई केंद्र कहाँ कहाँ है।

2. संस्था अगर इस कार्य को करवा रही है तो इससे पूर्व उसने कितने विक्रय केंद्र खोले थे उसमे से कितने विक्रय केंद्र चल रहे है, जो बन्द हुए है उनके बन्द होने का क्या कारण है। विक्रय केंद्र बन्द करने से पूर्व उस जगह के डीलर को क्या किराया, कमीशन आदि दिया गया, क्या विक्रय केंद्र बन्द करते समय उस क्षेत्र के डीलरों को इसकी जानकारी दी गई।

3. संस्था के मैनेजर और कर्मचारी कितने समय से कार्य कर रहे है, यहां आने से पहले वे किस विक्रय केंद्र पर थे। उस विक्रय केंद्र से यहां आने का क्या कारण रहा, क्या वह विक्रय केंद्र अभी चालू है या बन्द हो गया है, दोनो ही स्तिथि में पिछले 5 विक्रय केंद्र जहां आप काम करके आये है उनका पता बताएं।

4. पिछले 5 विक्रय केंद्र के किन्ही 10 डीलरों के नाम पता और फोन नम्बर आप बताएं जिन्हें आपने या संस्था ने किराया और कमीशन दिया है। कुछ डीलर्स के नाम, पता व मोबाइल नम्बर बताए जिनका ना बिकने वाला कपड़ा आप पैसा देकर वापिस लाये है।

ठगे गए लोग अधिकतर संगठित नही हो पाते है साथ ही अधिकतर लोगों से 6000 या 12000 रुपये की ठगी होती है जो सुनने में बहुत थोड़ी नजर आती है मगर यही रकम जब 100 लोगों से ली जाती है तो औसतन बढ़कर 9 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। ये रकम वो होती है जो एडवांस के रूप में ली जाती है, इसके बाद ये जो उधार देने के नाम पर 10 हजार से लेकर 50 हजार तक रुपया जमा करते है वह ठगी गई रकम अलग होती है।

आपको बता दें कि ये ठग लोग क्या क्या ठग कर जाते है। जो लोग एडवांस देते है मगर कपड़ा नही उठा पाते उनका एडवांस, जो कपड़ा उठा लेते है उनका किराया ओर कमीशन, साथ ही वह कपड़ा जो ना बिकने पर बदल दिए जाने की गारंटी होती है, वह दुकान जो ना चलने पर 3 माह बाद पूरी बन्द करके सारा कपड़ा वापस संस्था को देकर पैसा वापसी की गारंटी, साथ ही साल भर में कई जाने वाली सेल पर 10 प्रतिशत बोनस की गारंटी। सभी कुछ ये ठग लेकर भाग जाते है क्योंकि ये जब तक कमीशन या किराया आदि देने का समय आता है तब तक कभी रुकते ही नही है,

अंत मे ठगे गए लोगों के पास रह जाता है साहूकार से लिये गए कर्ज का ब्याज, बीबी के गहने या जमीन गिरवी रखने का दर्द, बेटी की शादी, बच्चों की पढ़ाई का दर्द, लाये गए कपड़े को ना बिकने के कारण हर वक्त उस कपड़े को देख कर खुद को और उस कपड़े को कोसते हुए इन ठगों को कोसने का अनवरत सिलसिला।

इन ठगों के बारे में हमारी आमने सामने बैठकर ADG चम्बल राजा बाबू सिंह से बात हुई, उन्होंने हमारी बात को सुना, समझा और SP शिवपुरी को तत्काल कार्यवाही करने के आदेश दिए, हमने ADG चम्बल को इन ठगों की लोकेशन भी दे दी है।

हम स्वयं ग्वालियर से बैराड़ के लिए निकल रहे है, देखना है कि पुलिस इन ठगों पर क्या कार्यवाही करती है। इन ठगों के नाम है देवेंद्र शिवहरे उर्फ लला(सरगना), गिरराज बोहरे (सरगना), रामगोविंद ओझा उर्फ रामू ओझा, कमलेश शिवहरे, रामकुमार शिवहरे, बी एन शिवहरे व अन्य।

बीबीसी लाइव न्यूज़ के लिए राकेश गुप्ता की विशेष रिपोर्ट